गणेश मैथिल केर नाटक ‘जागू’

आइ ई-मिथिला पर अबारी,मधुबनी निवासी गणेश मैथिल केर नाटक ‘जागू’क दू टा दृश्य देल जा रहल अछि.  एम कॉम गणेश मैथिल एखन गुवाहाटी, असम मे रहि अध्ययन-अध्ययापन सँ जीवकोपार्जन करैत छथि आ मिथिला-मैथिलीक सेवा मे लागल छथि. हिनक नाटक ‘जागू ‘ तेहन समय मे आयल अछि जखन युवा रचनाकार सभ एहि विधा सँ विमुख भेल जा रहल छथि, पढ़ि केँ कहू – मॉडरेटर. 

पात्र परिचय :

१. नारायण :  गृहस्थ , उम्र ४५ वर्ष

२. लक्ष्मी: नारायणक  पत्नी , उम्र ४० वर्ष

३.लाल काकी: नारायणक  माए, उम्र ६५ वर्ष

४. विष्णुदेव: एगो  समाज सेवक , उम्र ४० वर्ष

५.अकबर:एगो  साधारण बुद्धिजीवी  व्यक्ति , उम्र ३५ वर्ष

६.गीता : नारायण के ज्येष्ठ कन्या,उम्र १५ वर्ष

७.बिल्टू: बी.ए.पास एगो  बेरोजगार युवक ,उम्र २३ वर्ष

८. नन्हकू काका: एक बुजुर्ग ,उम्र ६० वर्ष

९. रहीम: १५ वर्षक अनपढ़ बालक

१०.सोहन:१३ वर्षक अनपढ़ बालक

११.मोहित: १६ वर्षक अनपढ़

 प्रथम दृश्य:

समय: राइत

(दलानक दृश्य , अषाड़क अन्हरिया राइत, लालटेन जरैत, दलान पर चिंतित मुद्रा मे नारायण टहलैत| नेपथ्य मे प्रसूति पीड़ा सँ लक्ष्मी कराहैत , थोड़े देर बाद बच्चाक जन्म आ कनबाक ध्वनि )

लाल काकी : (रुदन करैत प्रवेश ) रे नारायनमा ! रे नारायनमा !!

नारायण : की भेलई माए? की भेलई ??

लाल काकी: तोहर कर्म फुटि गेलौ रौ ! ई कुलक्षणी नामक लक्ष्मी चारीम बेटी कें जन्म देलकौए  रौ ! अरे देव रौ देव !! कौ न मुखे एकर पाएर हमर घर मे पड़ल रौ देव ! बेटी के बाहिड़ लगा देलकौ रौ देव !!

कोना क’ चारिटा बेटी के विआहबाए रौ नारायणमा  ? देहो बिकीन लेबा’ तइयो नै पार लगतौ रौ ! तोड़ा कहने छलिऔ दोसर विआह क’ ले’ –एहि मौगिया सँ तोड़ा बेटा नै हेतौ , मुदा , तू नै मानलें  हमर बात ! आब वंश कौना चलतौ रौ नारायणमा ?(जोड़ जोड़ सँ छाती पिटैत)

नारायण :(माए के बुझबैत ) माए! माए!! ई अहाँ किदौन कहाँ दून कियाक बजैत छी ?–एहि मे लक्ष्मी कें कोन दोष थिक ? ई त’ भगवतिक कृपा ! एखन लक्ष्मी प्रसूति पीड़ा मे छथि , हुनका ऊपर एहन असहनीय  दुर्वचनक बाण नै चलाऊ !!

लाल काकी:(खौझा’ क बजैत ) त’ तोहर की मोन ? फूल-पान ल’ आरती उतारीयनि!!

नारायण: हँ माए हँ ! लक्ष्मी आई फेर एक लक्ष्मी कें जन्म देलिहए | माए! अहाँ जनैत छी –कन्यादान सभ सँ पैघ यज्ञ थिक | सौभाग्यवश: भगवतिक कृपा सँ हमरा चारिटा यज्ञक फल भेटबाक अवसर भेटलए | अहाँ जुनि व्यर्थ चिंतित हौ |

      (विष्णुदेवक प्रवेश )

विष्णुदेव :लाल काकी , एना कियाक खौंझाएल छी ?

लाल काकी: ई लक्ष्मी रानी फेर बेटी बिएलिहाए !!

विष्णुदेव: ई त’ हर्षक गप थिक ! बेटी के जन्म –बुझू साक्षात् लक्ष्मी के जन्म !! एहि मे एतेक खौंझेबाक कोन …..

लाल काकी:(बीचे मे टोकैत) हाँ …हाँ …., ‘दोसरक घर जरैत छै त’ तमाशा देखबा मे बड्ड नीक लगैत छै …मुदा ,जखन अपन घर जरैत छै त’ आगिक दाह बुझि पड़ैत छै |’ अपना बेटी नै अछि ने , दूटा बेटे अछि –ताँए एहन गप  निकलैया…

.

नारायण: माए….! अहाँ चुप रहब की नै ? (विष्णुदेव के)– भाई , क्षमा करब ! माएक गप के जुनि …..

विष्णुदेव: …..भाई ! ई की करै छी ? अहाँक माए हमरो माए | हम काकी कें दुःख बुझि सकैत छियनि ! मुदा मनुष्य की क’ सकैत अछि …..??

(लाल काकी के बुझबैत ) काकी जुनि खौंझाऊ ! कने सोचू !  पहिल- जे अहूँ  त’ बेटी छी ! जौं बेटी नै  हेती त’ बेटा-बेटी के जन्म के देत ?? दोसर स्त्री भ’ स्त्री के प्रति दुर्यव्यव्हार , इ उचित नै थिक !

तेसर- बेटा-बेटी कें जन्म स्त्री द्वारा निर्धारित नै होइत अछि | विज्ञानं बतबैया कि बेटी-बेटा कें निर्धारण पुरुष दवारा होइत अछि |–ताँए जँ  नारायण भाई कें चारिटा बेटी भेलनि त’ एहि मे लक्ष्मी भौजी कें कोनो दोष नै | …ओ त’ साक्षात् लक्ष्मी छथि |…..काकी !अहाँ के त’ पाँच टा पुतौहु छथि –काएटा  लग मे रहि सेवा करै छथि ? एक लक्ष्मी भौजी छथि जेँ तन-मन-धन सँ अहाँक सेवा मे समर्पित रहैत छथि |….चलु ,एहि समय हुनका अहाँक जरुरत छन्हि | सास आ माए मे कोनो अन्तर नै होइत छै |

(लाल काकी अन्दर जाईत छथि )

    पर्दा खसैत अछि ……प्रथम दृश्य के समाप्ति |||

दोसर दृश्य 

(सोइरिक दृश्य )

(नारायणक प्रवेश )

नारायण:: (लक्ष्मी सँ )…नीके छी ने ? (बच्चा कें कोरा मे उठा लैत छथि )….लक्ष्मी , ई त’ बिल्कुल अहींक दोसर रूप बुझि पड़ैत अछि !

लक्ष्मी:: गीता के बाबू , हम बड्ड अभागिन छी ! हम अहाँ कें बेटा नै द’ सकलौं ! माए ठीके कहै छली , अहाँ दोसर विआह क’ लियह….

नारायण:: (बीचे मे )….लक्ष्मी !!…ई अहाँ की कहैत छी ? दोसर विआह ! ओ हम!! कदापि नै !!! हमरा बेटा नै भेल त’ एहि मे अहाँक कोन दोष ? जँ  हमरा भाग्य मे बेटा नै होएत त’ चारियोटा विआह केने कोनो लाभ नै …

लक्ष्मी::..मुदा, अहाँक वंश…

नारायण:: ….की बेटी बापक अंश नै होइत अछि ? बेटीए सँ वंश चलत | देखिलियौ, नेहरूजी कें वंश इंदिरा गाँधी सँ चलि रहल छन्हि |

लक्ष्मी::..हम अहाँक भावना कें बुझैत छी , मुदा, ई समाज नै बुझत ! हमरा सब दिन निपुत्री होएबाक उलाहना सुनै पड़त |

नारायण:: त’ की समाजक डर सँ हम अपन जिनगी नरक बना लीअ? की हम दोसर विआह करू ? वा बेटा के इंतजार मे एक सोरहि धिया-पुता जन्माऊ ?…लक्ष्मी , समाज एहिना कहैत रहत …भुगतअ त’ अपना सभ कें पड़त | हम कहैत छी —आब ऑपरेशन करा’ लीअ | आजुक युग मे एक -स -दू धिया -पुता बड्ड भेलहि, चाहे बेटा हुए वा बेटी …

लक्ष्मी::..हम कहिया मना केलहूँवाँ ! हम त’ दोसरे बेटी के बाद ऑपरेशन कराबअ लेल माइर केने रही, मुदा, माए जिद्द करए लगली…

नारायण::…नै, आब किनको जिद्द नै नै चलतैन ! अहाँ सोइरी सँ निकलू , तखन ऑपरेशन भ’ जाएत |

        (नारायण…नारायण …नेपथ्य सँ नारायण के केओ सो पाडैत)…याह एलौ …

नारायणक प्रस्थान ….(पर्दा खसैत अछि )

  दोसर दृश्यक: समाप्ति

शेष दृश्य सेहो जल्दिए

संपर्क:

गणेश मैथिल 

ईमेल -bawra.g@gmail .com 

मोबाइल -09864406875

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