आदिकाल सँ कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह

पाँच गोट कविता : रोमिशा 

रोमिशा मैथिली कविताक प्रतिनिधि स्त्री स्वरक रूप मे स्थापित भए रहलीह अछि। सम्बन्ध आ समजाक द्वन्द मे स्त्रीक चिर्रीचोथ होइत अस्तित्वक तसदीक करैत हिनक कविता स्त्रीक अव्यक्त मनोभावक सार्थक चित्रण प्रस्तुत करैत अछि। प्रतिकारक सामर्थ्य आ वस्तु-विषयक महीन विश्लेषण एहि कविता सभक ‘ट्रेडमार्क’अछि आ अपन टोन मे लाउड रहितहुँ सम्प्रेषण सामर्थ्य सँ कविता कथ्यक निजता केँ स्थापित करैत अछि। प्रेम आ वासनाक मध्य चुल्हिक आगि सँ सीधैत स्त्री जीवनक धुकधुकी हियासैत रोमिशा अपन कविता सँ स्त्री विमर्शक नव दृष्टिकोण ठाढ़ करैत छथि। रोमिशा जी एखन सम्प्रति दिल्ली मे रहि रहलीह अछि। हिनक पहिल काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन छनि। हिनका सँ romishajha@gmail.com संपर्क कएल जाए सकैत अछि ]


प्रेम आ वासनाक मध्य ठाढ़ स्त्री 
ओना तँ ई सब दोग सान्हि  मे होइते रहैत

छलकोनो उद्यान, गलियारा, सिनमाघर, मैक.डी, सी.सी.डी, के.एफ.सी या कोनो

आन ठामकखनो -कखनो गाम घरक कोनो कोठीक दोग मेकल पर, आमक गाछी मे, मेला -ठेला

सगरोबहुत बेर आदिकाल सँ तँ कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह…


आब जखन स्वतंत्रताक महायात्रा पर निकलल अछि स्त्री तँ कतेक स्वतंत्रता देतनि ई समाज हुनका प्रेम लेल ?


दम तोड़ैत दामपत्यक कामुकताक लिप्सा मे लटपटायलसेक्स नामक भूखक स्टार्टर भए कए रहि

जेतीह स्त्री मेन कोर्स सदिखन पुरुख लेल घर मे बैसल स्त्री होइत छथि…


आ जे स्त्री वा कि पुरुख वास्तव मे दुखी छथि  से भक्ष्य बनल छथि दांपत्यक असफलताक हुनका

ढालि देल गेल अछिएकटा सामाजिक एहन खाँच मेजाहि सँ मुक्ति बड्ड कठिन किएक तँ खुँटेसल रहै

छथि ओ सब दिन सँ राति धरिगृहस्थीक एहन खूँटा मेजे सदिखन मुँह मे आंगुर कोंचि – कोंचि वमन

करबबैत अछि संस्कारक मोन मे घुरियबैत रहैत अछि अनन्त प्रश्न कपार उघैत रहैत अछि मर्यादाक

बोझलत्तम जुत्ती कन्नारोहट कए पुन: व्याकुल भए  जाइत छथि  अप्पन नेनाक आँखि मे उतरि

आएल लड़खड़ाइत-थरथराइत जीवनक दुःस्वप्न देखि ओ फेर सँ समेट लैत छथि अपना केँ  आ पुनः

झोंका जाइ छथि गृहस्थीक भट्टी मे …..


फेर ई न्यायालयक निर्णय ककर हित मे? पाश्चात्य गलियाराक संस्कृति पसारि वासनाक क्रेता-

विक्रेता बनि जाएत समाजकामाकुल आर्थिक संपन्न लोक उजाड़ि देत कतेको घर-

गृहस्थी अनायासहि सब भए जाएत परित्यक्त वा परित्यक्तासमाज मे बनबैत एकटा ब्लैक होलजाहि

मे असीम वेग सँ भसिया हेरा जायब हम सब.


मानू ई बात जे ई स्वतंत्रता प्रेम लेल नहि अछि प्रेम लेल कोनो स्वतंत्रताक खगता नहिदेह सँ इतर

होइत अछि प्रेमएहि दुनियाँ सँ  ओहि दुनिया धरिक  यात्रा कए सकैत अछि प्रेम बिना कोनो स्पर्शक

आ आत्मग्लानि केँ 

आहुति 
चुल्हाक आगि सँ लुत्ती उड़ए लागल अछिपछबाक साँय-साँय कोन दिस लए जाएत लुत्ती, की पताकोनो चार जरत आ कि गोहाली आ कि  गामक-गाम जरि जाएत से नहि पता मुदा लुत्ती  उड़ल अछि तँ  किछु तँ जड़त कियैक तँ चुल्हि मे झोंकि देने छथि ओएक संग कतेक रास चेड़ाहुनका इच्छा छनि चुल्हि  पजाड़ि के पूर्णाहूति देबाक मिथिलाक शिथिलताक नामजतए  बेचए  छथि बेटाक माय अप्पन कोखिआ पाग पहिरने द्वार  लागैत अछि अनगिन बरियाती मौसक बुट्टी पर भुखायल मांसाहारी पशु सनओ देमए चाहैत छथि एकटा पूर्णाहूति ओहि मिथिलाकजकर ‘मैथिली’ अपार कष्ट सहैत धरती तर चलि गेलीइच्छा  हुनको होइ छनि करबाक जयगानपान,, मखान, मिश्री, अरिपन, पानि – पीढी चानन-टिक्का, धोती-कुरता आ दोपटाक मुदा ओ सोचए लगै छथि  कि पाग पहिरए आ पहिराबए बला गणमान्य सब नहि देखैत छथिआइ हर घर मँ सीताक रुद्र वीणा बजबैत आ गुहाइर लगबैत कि हे धरती अहाँ हमरो लेल फाटूफाटू ओइ सँ पहिने जखन हमरा सीबय पड़तअपन फाटल करेजा कें कोनो बिकायल राम लेल 
हे मैथिल अहाँ  भाषा बचबै सँ पहिने बचाउभाषा सिखबैवाली  कें जकर गर्भ  पुरुष लेल बलि चढायल जा रहल अछिअहाँ बचबू सुखिया,  मुनिया, रितिया सन कतेक सरिसोंक फूल जकाँ फुलाएल दुसधटोली, चमरटोलिक बेटी केँ जकर देह गहुँमक कटाइ होइते पेरा जायतमात्र पिय्यर देह बनि कए कोसिक धार बहत उनटा, सतलुज दिस जतय ई सब फुलायल फूल मात्र कोखि  धरि बनि जाएतआ जकर नोर मिथिला पर कानैत समुद्र मे बिला जाएत

उच्छ्वास 
दूर ठाढ़ नीम गाछक कान्ह पर जे चान उतरल अछिअपसियाँत भेल तकैत कोनो आँगनजाहि ठाम उतरि ओ थाहि लिअए किधरती एखनो धरि सौरमंडलक संतान छियै…
ठीक ओहने काल मे जमीन पर पसरल  दूभि परलिखल जा रहल अछि देहक जाति तखने दूर ठाढ़ पहाड़ ताकि रहल अछि कोनो हताश घर जे फकसियारि करैत हुअए सूरजक प्रकाश  लेलआर ओहिने समय मे तेज कयल  जा रहल अछि अप्पन -अप्पन जीहक धार जाहि सँ निकलल शब्द रोकि देतए फेर सँमनुष्यताक बाटक इजोत जाहि संबचल रहै  कोनो  टूटल मंदिर, छुतायल इनारदरकैत आरक्षित चहारदीवारी प्रतीक्षा मे  मनुष्यक, मनुष्यताक शृखंला मेखुलि कए  उच्छवास लैत देखबाक इच्छा मे ठाढ़…….

माय आ भगवती 
नौ दुर्गाक, पहिल पूजा सँनवम दिन धरिरोज साँझुक पहर सँ पहिने तीन कमराक एकटा बन्द फ्लैटक तीन फिटिया बालकोनी मे बैसिमाय रोज आधा घंटा लगा बनबय छथिन माटिक दीपओ जीवनक संग्राम मे लहूलुहान भेलाक बादो भगवती लेल बचेने छथिन अप्पन स्नेहएकदम सुच्चा ओहि रूप मे जाहि मे हुनका भेल छलनि पहिल दीपक संग्यानएहि दीप बनेबाक एखन तक केर यात्रा मेकतेक मनोभाव ढहि गेलकतेक अन्हार पसरि  गेलकतेक शब्द भए गेल अलोपित शब्दकोश सँजीवनक कतेक ऊष्मा बिला गेल धुआँ बनि हवा संग लुप्त भए गेल मोनक सुन्दरता नष्ट भए गेल सब कविता मुदा माय केने रहल अहर्निश अभियान जारी आत्मा सँ अन्धकारक असंख्य स्मृति चिन्ह मेटबैत जोगबैत सब संबन्ध लेल स्नेह रोपने रहल अप्पन मोन मे स्नेहक हरशृंगारक गाछ जीवनक भोरक उजास भरैत अपना मेओ बचेने रहलीह प्रेम भगवतियोक लेल ओहिना   मुदा की ओ कहिओ बुझि सकथिनजे ई दीप जे भगवती लेल बनय छै कतेक काँच आ तन्नुक होइत अछि ओहि माटि मे स्त्रीक दम तोड़ैत असोथकित विश्वासक कतेक अस्फुट्ट प्रश्न सना जाइत अछि भरि साल लेल छोड़ैत हुनका लग व्यर्थक धीरज जे भगवती स्त्रीक जीवन मे प्रकाश जरूर आनथिन आ अहि विश्वास सँ बचल रहैत छनि हुनकर घर -गृहस्थी , पति संतान आ अरिजन -परिजन सब संग आसक्ति ओहिना जेना हरसिंगारक गाछ पर पसरल रहै छै भूअा छितरायल रहै छै जमीन पर डारि सँ अलग फूल आ गाछ नितान्त एकाकीपन मे डोलैत भोगैत रहै छथि वएह पीड़ा जे भोगए छथिन भगवती 

सृजनक दूभि
अहाँ बंद कमराक पाँछा की करए छी ई हम्मर हिस्साक प्रश्न नहि अहाँक सिगरेटक धुआँकमराक हवा संग उड़िया जाएत किछु ढेंगरायल खलिया बोतल कबाड़ी बला लए जाएत ओछाइनक सिलवट अहाँ स्वंय सोझ कए लेबई सब हम्मर मतलबक प्रश्न नहि अछिमुदा जखन अहाँक प्रेमक आगिकोनो देह कें जरा के संस्कृति कें छाउर करत आ ओइ छाउरक गर्भ मेनव जान करवट लेबय लागत तखन हम सोचए लगैत छी आ सोचनाय आवश्यक अछि किएक तँ ई नहि तँ सिगरेटक धुआँ अछिनहि खलिया बोतलनहि चादरक सिलवट ई तँ संस्कृतिक सारा पर उगि आएल सृजनक हरियर दूभि अछि जकरा कोन ईश्वरक आशीर्वादक साक्षी मानल जाए ई ककरो नहि पता …
एकरा तँ अहाँ मात्र लिवइन रिलेशनशिपकएकटा मिसटेकक नाम पर इरेज कए देबै देह आ स्मृतिक परिधि सँ  बाहर…
***[प्रयुक्त सभटा रेखाचित्र अनुप्रियाक छनि.]

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