अश्विनी कुमार तिवारी केर दस टा कविता

ई-मिथिला पर आइ मिथिलामे पलल-बढ़ल, देवरिया यू.पी. केर रहनिहार अश्विनी कुमार तिवारी केर दस टा कविता देल जा रहल अछि. हिनक ई कविता सब, आन भाषा-भाषीक भ’ खाली मैथिलीमे लिखबेक कारणे नहि अपितु रचनाक उत्तकृष्टता, लयात्मकता, शिल्पक सुंदरता आ भाव-भंगिमाक कारणे साझा कयल जा रहल अछि. अश्विनीजी आइ-काल्हि चम्बा, हिमाचल प्रदेश एनएचपीसी लिमिटेडक बैरा स्यूल पावर स्टेशनमे असिसटेंट इंजीनियर छथि – माॅडरेटर.

(1) मैथिली

मैथिली सन मीठ मधुकर , केँ भी नञि छै मधु रे ।

नञि रसालक रस ओते , बस माय के छै कोड़ रे ॥

मैथिली सन प्रीत नेहगर , नइ छै प्रिया केँ प्रीत रे ।

नहि भौतिक नहि आत्मिक , नहि स्वर्गक वास रे ॥

मातृभाषा केँ जँ बिसरि केँ , चाहबै उन्नति करी ….।

आत्मा के शांति मन केँ , नञि बचत किछु पास रे ॥

(2) समाज  

पाँचों आंगुर नहि एक समान ,

मुदा , खाय बेर सब एक ठाम ।

सबहक छै अप्पन अप्पन काज ,

जखनहि मुट्ठी तखनहि समाज ॥

सबहक नहि होयत एक्कहि इलाज

भने रोग बरु एक्कहि व्यथाक ।

मात्र बैदेहि टा छथि बुझि सकैत ,

ककरा लेल कतेक अंश हेतैक ॥

किंतु एखन की समय एलैक ,

बेकति केँ बुधि की हेरा गैलैक ।

बुझैत गप्प नहि छै कनी कनेक ,

चना नै असगर छै भाँड़ फोड़ैत ॥

ढेर जोगीया मठ होयत उजाड़ ,

कहबी छै मीता ई बड्ड पुरान ।

समाज पूर्ण बरु तखनहि कहैत ,

जतय सब बरन हिलिमिलि रहैत ॥

नहि छै अछोप नहि छै विशेष ,

मुदा काज सभक नहि छै एक ।

सभक जरूरति समय-समय पर ,

यौ कतहु सुइ कतहु तरुआरि ॥

 यौ कखन आबि जायत कोन काज

विभिन्नताक बुझु परिचय समाज ।

अप्पन हाथक सब आंगुर समान

बनि मुट्ठी रहू बनि कय समाज ॥

(3) दृष्टिकोण  

जे पुरूख स्त्रीक सानिध्य लेल लुलुआइत छथि !

एक झलक देखितथि गप्प एक्को बेर क’ लैतथि ,

प्राण देमय हेतु तत्पर बस इशाराक देर होइत ।

सैह स्त्री सानिध्याकांछी पुरुख पति बनैत देरी ,

पत्नीक लेल पाथरिक कियैक भय जाइत छथि ।

अलभ्य दुर्लभ स्वप्निल स्त्री लेल उत्सुक अबोध ,

पत्नीक प्रताड़ना मे करैत छथि पुरुषत्वक बोध ।

की जे सुलभ सहज प्राप्य से प्रिय नहि होइछ !

की अगम्यक आग्रही केँ प्राप्य रत्न बेमोल अछि !

की यैह मनोभाव कलियुग केँ कलियुग बनबैछ ?

 (4) मदनक सायक 

अहा केहन अपुर्व तोहर छवि, सोहल गै, मनहि मोहलक ।

राति पूनमक छटा जेना शशि, परसल गै, हिय हरसौलक ॥

जेना भोरहरुका अकास रवि, निखरल गै, जहि कठुआयल ।

आरूणि नयना बयन मधुर पुनि, लजरल गै, चित हरषायल ॥

बिहुसैत मुखछवि काँच बयस धनि , लागल गै, मदनक सायक ।

कहल अश्विनी बामहि छथि विधि , उपटल गै, हिय परिचायक ॥

  (5) सैह !!  

घाम बहैत अछि जकरे सबतरि ,

घामक लाज बचायत सैह |

जे मनुक्ख नहि मात्र जन्म सय ,

राम राज्य केँ आनत वैह ||

 अन्नदाता केँ जे समाज नहि ,

सुतय भुक्खल पेट देत |

शोणित केँ जे बुझत मोल गहि ,

उत्थान करत सतत सैह ||

दयाद्र प्रेम नहि भूखल सम्मानक ,

श्रमिक उदर केँ बूझत सैह |

अपन नेह सय नोर मनुक्खक ,

पोछय चुल्हि पजारत वैह ||

मूल उचित मुदा नव कोपलक ,

मोल बिसरि जेतै जैह |

नव सृजन केँ नव पल्लवक ,

वृद्धि आर कहु रोकत केँ ||

नव शब्द नव भाव काव्य महि ,

सिंचैत अप्पन रक्त सैह |

भाषाक निरंतर बहैत प्रवाह केँ ,

बहवैत नित रहता वैह ||

 (6) असंतुलन  

नीक संगे बेजाय नहि रहतै ।

तऽ नीक केँ नीक केँ कहतै ॥

षटरस केँ प्रभाव नहि रहतै ।

तऽ जीह मे स्वाद की बचतै ॥

सब तारा जे सुरुज भ’ जेतै ।

दिन केँ महत्व की रहि जेतै ॥

सब मनुक्ख जँ आदर्शे रहतै ।

राम केँ तहन लोक की पुजतै ॥

नीच केँ नहि रहने की बहतै ।

प्रवाह रुकतै तँ वृद्धि की हेतै ॥

जीवन लेल असंतुलन जरूरी छै ।

थम्हि जेतै तँ जीवने की रहतै ॥

(7) बुधियारी 

जँ नहि रहबै लागल ,

तँ कोना रहबै बाझल ,

जिनगी केँ आरि पर ,

कोना रहबै साटल ।

बहुत कठिन छै बाँचल ,

झूठ-सच केँ छै लांछन ,

बीच मे सम्हरि कय ,

प्राण कोना बाँचत ।

गप जे छी कहि रहल ,

अनठौने बरु नहि रहब ,

अमृत केँ चाह मे ,

गरल केँ पिबय पड़त ।

ककर ई समय रहल ,

प्रतीक्षा ककर कयल ,

चौकस जँ रहबै नहि ,

फेर अहाँ की रहल ।

बुद्धि जँ सजग रहल ,

फेर कहु की बचत ,

सब केँ अजवारि लेब ,

जँ प्रेम सँ भरल रहब ।

(8) कविपत्नी

नोचैत माथ कपार पीटैत ,

कविता मे वनिता केँ ढुढ़ैत ,

कविपत्नी केँ कवि बुझबैत ,

अहींक देखि हम छी लिखैत ।

सबसँ बुरबक हमहीं अछैत ,

 मन सँ हमर छी अहाँ खेलैत ,

 कतय अहाँ छी लाइन मारैत ,

बियाहल छी ! नहि छी लजैत ।

बाबू हमर ई की क’ देलथि ,

कवि सँ नाता जोरि देलथि ,

वाम बिधाता कोना भेलथि ,

एहन कुलच्छन पिया भेलथि ।

पत्नी छन छन शंका करैत ,

कविक छाती पर मूँग दलैत ,

‘अश्विनी’ कहल साकांछ रहैत ,

पत्नी नहि ई कविता पढ़ि लैथ ।

(9) चतुष्पदी  

चञ्चल चितवन चितचोर चपल ,

चपला चतुरा चितवासि सखे ।

मङ्गल मृदुल मुकुल मारक मन ,

मनभाव महा मधुराञ्चल हे ॥1॥

मञ्जुल मुकुलित मन मानसरस ,

मनजा मनसा मनगामिनि हे ।

प्राञ्जल प्रमुदित पल प्राप्त पलित ,

पंचशायक धारक मारक हे ॥2॥

जीवन जगत जगत ज्योतिर्मय ,

जपध्यान जपा जपहारिणि हे ।

हे हरि ! हियगति हतप्राणक हल ,

हृदयाञ्चल यात्रिक आयसु हे ॥3॥

‘अश्विनि’ कहल अब आशकिरण ,

अतुला वनिता अभिलाषि प्रिये ।

चञ्चल चितवन चितचोर चपल ,

चपला चतुरा चितवासि सखे ॥4॥

(10) बेवफा 

बेवफा कहि तँ देलियै बड़ आक्रोश सँ सोचलियै कनिको ,

वफा निभावय लेल अहीं बरु कहु किछु केलियै कनिको ,

जिनगी भरि उम्मीद ओकरे सँ रखलियै मुदा की अहाँ ,

अपनो दिस सँ एकाध कदम आगा बढ़ेलियै कनिको ।

माय बाबू समाज सँ हँसि वो नुका कतेक कनने होयत ,

अहाँक शब्द केँ नहि सम्हारबाक दर्द कोना सहने होयत ,

अहि प्यार केँ सवाल केँ जबाब भला की पुछने होयत ,

बेवफा बुझि ठुकराबै छी जे कतेक देवता पुजने होयत ।

अपना प्यार पर इलजाम लगौने भला कहियौ की होयत ,

समाजक संरचना मे फँसल अहुँ छी ओहो रहले न होयत ,

जे कहानी अपन परिणति केँ नहि पावि सकल मुर्त रूप ,

ओहि प्यार केँ जोगेने रहब दिल मे तँ कहु की होयत ।

रचनाकार संपर्क –

अश्विनी कुमार तिवारी

मोबाईल न0 : 09816050827

Email : ashwininhpc@gmail.com

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